गुलदस्ता - 1
" शाम "
डूबता सूरज लेकर आया एक हसीन शाम,
जब मिल तो गया था मुझे किसी का पैग़ाम,
तब हडबडाहट में तो मैं नही दे सका सलाम,
बात फ़िर ऐसी हुई कि रात भर न मिला आराम ।
------------------------------
" ज़रूर "
आँखें हैं धुन्धुली मगर जाना है बहुत दूर,
इस ज़िद्द ने तो मुझे कर दिया है मजबूर,
भले सभी समझें इस फ़ैसले को गुरूर,
मंजिल तक तो पहुंचना है मुझे ज़रूर ।
------------------------------
" कहानी "
जैसे नदियों में बहता पानी,
और यह भीगी रुत सुहानी,
हर चीज़ तो है आनी जानी,
वैसे ही है मेरी छोटी कहानी ।
हर चीज़ तो है आनी जानी,
वैसे ही है मेरी छोटी कहानी ।
------------------------------
" परी "
जैसे उस पार की चीज़ लगती है और हरी,
वैसे ही शायद खयालों में जन्नत की परी,
गौर करे तो लगेगा यह बात है सही और खरी,
असल में यह दुनिया है काँटों से भी भरी ।
------------------------------
" चिराग "
सूरज की रोशनी नज़र आते ही होते हम जाग,
नयी उम्मीद के साथ ओर होटों पर लिए नया राग,
भूल जाते हैं कि पुनः शाम को जलेगा चिराग,
जीवन के इस खेल में 'कभी आग तो कभी दाग' ।
------------------------------ --
" खास "
जब कभी कोई नही रहता आस पास,
तब होता क्यों है ऐसा अनोखा एहसास,
जैसे कि हर एक पल है बेकार और बकवास,
वैसे क्या पहले कभी कुछ हुआ था खास ?
------------------------------ -
" बेमिसाल "
अब दिमाग में गूंज रहा है एक सवाल,
अचानक ही उभर आया है यह खयाल,
क्या मुकद्दर में लिखा है ऐसा एक साल,
जो लगेगा हर शख्स को एकदम बेमिसाल ।
------------------------------ -
" उलझन "
जेब तो फ़टी है, कब तक सिल जायेगी,
आगे चल कर क्या किस्मत तरस खायेगी,
ज़िंदगी की उलझन क्या यूँ ही रुलायेगी,
या बहार लाकर फ़िर से खुशी लायेगी ?
------------------------------ -
सूरज की रोशनी नज़र आते ही होते हम जाग,
नयी उम्मीद के साथ ओर होटों पर लिए नया राग,
भूल जाते हैं कि पुनः शाम को जलेगा चिराग,
जीवन के इस खेल में 'कभी आग तो कभी दाग' ।
------------------------------
" खास "
जब कभी कोई नही रहता आस पास,
तब होता क्यों है ऐसा अनोखा एहसास,
जैसे कि हर एक पल है बेकार और बकवास,
वैसे क्या पहले कभी कुछ हुआ था खास ?
------------------------------
" बेमिसाल "
अब दिमाग में गूंज रहा है एक सवाल,
अचानक ही उभर आया है यह खयाल,
क्या मुकद्दर में लिखा है ऐसा एक साल,
जो लगेगा हर शख्स को एकदम बेमिसाल ।
------------------------------
" उलझन "
जेब तो फ़टी है, कब तक सिल जायेगी,
आगे चल कर क्या किस्मत तरस खायेगी,
ज़िंदगी की उलझन क्या यूँ ही रुलायेगी,
या बहार लाकर फ़िर से खुशी लायेगी ?
------------------------------
" मुलाक़ात "
गर्मीयों से राहत दिलाती है बरसात,
शाम के आँचल से निकलती है रात,
दिल की नज़र से पेश हुई एक बात,
इन्तज़ार के बाद ही होती मुलाक़ात
------------------------------ -
" साया "
अब तो मैं हूँ और साथ में अपना साया,
पता नहीं चला मैं किस लिए यहाँ आया,
इतने साल जीने के बाद क्या कुछ पाया,
अगर किसी के मुखडे पर मुस्कान लाया,
तो मैं कह दूँगा कि यह है केवल माया ।
------------------------------ -
गर्मीयों से राहत दिलाती है बरसात,
शाम के आँचल से निकलती है रात,
दिल की नज़र से पेश हुई एक बात,
इन्तज़ार के बाद ही होती मुलाक़ात
------------------------------
" साया "
अब तो मैं हूँ और साथ में अपना साया,
पता नहीं चला मैं किस लिए यहाँ आया,
इतने साल जीने के बाद क्या कुछ पाया,
अगर किसी के मुखडे पर मुस्कान लाया,
तो मैं कह दूँगा कि यह है केवल माया ।
------------------------------
Comments
Post a Comment