गुलदस्ता - 2
" बेशूमार "
हासिल होगा क्या अब कर के और इन्तज़ार,
जब पहले से ही चली गयी है सारी बहार,
नज़रों में भी नहीं रहा बरसों से कोई खुमार,
लेकिन यादों की दौलत हैं अब भी बेशुमार ।
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" घबराना "
करवटों में सभी रातों को गुज़ारना,
तन्हाइयों में सारा ही दिन बीताना,
मौत का इन्तज़ार करना रोज़ाना
क्या ऐसी बातों से हैं अब घबराना ?
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" हल "
सब कुछ भले ही हो उज्ज्वल,
नज़दीक आ रहा है वह पल ,
जिस के बाद न होगा कोई कल,
क्या इस बात का है कोई हल ? !
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" सैलाब "
जब कभी दिल होने लगता है बेताब,
याद कीजिए कोई खूबसूरत सा ख्वाब,
तब महक उठेगा ज़िन्दगी का गुलाब,
रोक नही सकेगा खुशियों का सैलाब ।
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" गहना "
क्या सफ़ल होने के लिए ज़रूरी है बडा सपना ?
यह बात हम सुनते आये हैं, पर मेरा है कहना,
मन में तनाव के साथ, अपनों से भी दूर रहना,
क्या इस को मान सकते है अनमोल गहना ?
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" शोर "
रात के सन्नाटे में यह कैसा शोर ?
किसी घर में क्या घुस गया चोर ?
या बारिश में नाचने लगा है मोर ?
ऐ हवा, रुक जा, न कर ऐसा शोर !
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" साया "
उजाले में अपना साया पीच्छा करते रहता है,
लेकिन अन्धेरे में एकदम साथ छोड़ देता है ,
जीवन में भी हमसफर कभी अलग होता है,
डूबने से क्या कोई तिनका बचा सकता है ?
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" सच्चाई "
हर चमकती चीज़ होती नही है सोना,
इस बात को कैसे बताये, यही है रोना,
कुछ पाने के लिए तो पडता है कुछ खोना,
इस सच्चाई से कभी नही है मूंह मोडना ।
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" जीत "
बादलों में जब छिप जाता है तारा,
लगता है जैसे निखार गया है सारा,
अन्धकार से जिस ने कभी न हारा,
जीत उसी की तो होती है मेरे यारा ।
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" मूल "
सामने तो हैं धुन्ध, धुआं और धूल,
नीचे पडा है एक कुचला गया फ़ूल,
सब कुछ लगने लग गये जैसे भूल,
ऐसे में इन्सान का क्या रहा मूल ?
सामने तो हैं धुन्ध, धुआं और धूल,
नीचे पडा है एक कुचला गया फ़ूल,
सब कुछ लगने लग गये जैसे भूल,
ऐसे में इन्सान का क्या रहा मूल ?
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