गुलदस्ता - 3


                   " मैं "


मैं कोई नही हूँ इतना हुआ एहसास,

मुश्किल वक्त कोई नही है मेरे पास,

न देखा अब तक कोई मन्ज़र खास,

फिर भी दिल तो होता नही उदास ।

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                  " गुरुर "


एक दिन ऐसा भी आएगा ज़रूर,

जब अकेले रह कर होगा मजबूर,

तब क्या वक्त और क्या गुरूर,

अब ही से समझ लेना ए हुज़ूर.

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             " कश्मकश "


रास्ते में रुक जाऊँ, और सास लूँ,

या उल्टे पाव वापस ही चला जाऊँ ;

ऐ मेरे दिल अब बता मैं क्या करूँ,

कश्मकश है के यूँ जियूँ या मरूँ ।

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                  " डगर "


ज़िन्दगी की इन राहों पर,

आगे ही तो बढ रहा हूँ मगर,

दिखता नही कोई खास मंज़र,

कब तक चल सकूँ यह डगर ?

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                 " ख्वाब "


बचपन में देखा था एक ख्वाब ,

मैं तो बन जाऊँगा बडा जनाब,

अब दिखाई देता है एक तलाब,

ऐ दुनिया तेरा नही कोई जवाब.

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               " इल्ज़ाम "


जब खुद पर हम ने लिए हर एक इल्ज़ाम,

तब दोस्तों ने रख दिये हाथों में जाम ;

गैरों ने भी सरेआम लिए हम को ही थाम,

ऐसे में ज़रूर आ गया था दिल को आराम ।

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                   " इनाम "


अगर कोई सीमित कर दे ऐशोआराम,

ज़िन्दगी उज्जवल रहेगी सुबह से शाम ;

यह भी ज़रूरी नही हाथों में हो एक जाम,

मन की शान्ती ही तो है सब से बडा इनाम ।

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               " धन्यवाद "


ज़िन्दगी में बहुत कुछ खो देने के बाद,

मेरे लबों से निकली नही कोई फ़रियाद,

वजह है बीती लम्हों की सुनहरी याद,

लेकिन जो कुछ मिला, उस के लिए धन्यवाद ।

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                 " दास्तान "


हर अदा में उस की है एक ग़म की दास्तान,

लेकर किसी बात से ज़रूर है यूँ परेशान,

इस मजबूरी की वजह से न खोलती है ज़ुबान,

नही पता चला पहली मुलाक़ात के दरमियान ।

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                  " दीदार "


थोड़ी देर और कर सकूँ दीदार,

दिल ने यही चाहा था कई बार,

पर समय नही करता इन्तज़ार,

ऐसे में ज़रूर हुआ था बेक़रार ।

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