गुलदस्ता - 4
" मन्ज़िल "
कभी तो ऐसा लगता है कि बहुत दूर है मन्ज़िल,
कोशिश कर के भी कुछ होता नही है हासिल,ऐ
शायद धीरज रखने से आसान होगा हर मुश्किल,
लेकिन फ़ौरन हल की उम्मीद रहती है बिस्मिल ।
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" इन्तज़ार "
दिन भर तो करता रहा उसी का इन्तज़ार,
लेकिन वह मिलने नही आयी एक भी बार,
शायद इशारों से बता चुकी थी साफ़ इन्कार,
मालूम नही किस तरह समझा था मैं इकरार ।
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" गुस्सा "
किसी बेचारे का दिल तो कहीं उत्साह से धडका,
यह देख गुस्से से किसी का दिमाग भी खूब भडका,
लडकी शायद जान गयी थी कि वह लडका है कडका,
ऐसे मामलों में यकीनन कुसूर होता है सिर्फ दिल का ।
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" आँखें "
आँखें हर शख्स की कुछ करती हैं बयान,
खामोश रहते हुए भी होते है लोग परेशान,
कभी ऐसा भी लगता है कि फँसी है जान,
ऐसे में महसूस करते हैं जैसे आया तूफ़ान ।
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" समय "
समय का पहिया सदा घूमता ही जाये,
दिल की धडकन कभी काबू में न आये,
तक़दीर के झटके कमज़ोर को रुलाये,
ऐसी बातों को भला कोई कैसे भुलाये ।
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" इशारा "
देखते ही किसी के आँखों का इशारा,
अंदाज़ा हो जाता है सोच विचार धारा,
लेकिन ऐसा भी शख्स होता होगा बेचारा,
जिस के लिए होगा सब बताना दोबारा ।
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" नसीहत "
जो सब कुछ पा कर भी करेगा शिकायत,
एक दिन ज़रूर जान लेगा क्या है हक़ीक़त,
लेकिन इस वक्त नही सुनेगा कोई नसीहत,
अक्सर लोगों में नज़र आती है यह फ़ितरत ।
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" रुख "
ज़िन्दगी का रुख इस कदर गया है बदल,
हर कदम से पहले कहता हूँ ज़रा सम्भल,
नही सोचा था बचपन में ऐसा होगा कल,
अब सब्र से स्वागत है हर एक नया पल ।
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" दाग "
जब लगने लगती है कहीं भी आग,
यकीनन छोड़ जाता है गहरा दाग,
तब बदल जाता है जीवन का राग,
रहना तो पडता है हर समय जाग ।
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" मुमकिन "
जब आए है इस दुनिया में जीवन साथी बिन,
तब यह बात साफ़ है कि सब कुछ है मुमकिन,
खुद में हिम्मत बढ़ाते हुए हर रात और दिन,
स्वीकार करते हुए सुनहरें लम्हों को ही गिन ।
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