गुलदस्ता - 7
क्या सचमुच लोग लेते हैं कई जनम,
कहीं यह तो नहीं सिर्फ़ दिमागी वहम ?
इस बात पर भी होतें हैं चर्चाएं गरम,
शक़ है कि पिछली बार क्या आप थे हम !
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" जंग "
हर पल बदलती रहती है दुनिया का रंग,
सर के बल चलने से भी खत्म हुई उमंग,
पता नही अब कितने दिन रहेगा यह जंग,
बता कोविड,कब तक रहेगा अपने संग ? !
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" आफ़ताब "
नये दिन के साथ निकलता है आफ़ताब,
देते हुए मुफ़्त में अनेक किरण लाजवाब ;
सोचता होगा अब सभी होंगे कामयाब,
किसी का भी नही रहेगा अधूरा ख्वाब ।
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जैसे ही बढ़ने लगी है मेरी उम्र,
होने लगी है बहुत सारी फ़िक्र,
किसी ने किया मौत का ज़िक्र,
तडपता हूँ जैसे दिख गया कब्र ।
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" नज़ाकत "
ज़िन्दगी की यह रही एक खास हक़ीक़त,
खामोश उल्फ़त को ही कहते है इबादत,
क्यों कि इसी में है सादगी और नज़ाकत,
तनहा दिल से कभी न होगी कोई शिकायत ।
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" साल "
बहुत कम समय में खत्म होने को है यह साल,
आखिर कितने दिन खास थे, यह है खयाल,
खुश हूँ कि अब भी खा सकते है चावल दाल,
परवाह नही कि सर पर हैं और सफ़ेद बाल ।
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" तहज़ीब "
रिश्ते की बुनियाद होती है कितनी अजीब,
इसे कायम रखती है सिर्फ़ अपनी तहज़ीब,
कोई हो अमीर या ग़रीब, पर ज़रूरी है तरतीब,
इज्ज़त भी साथ हो तो बन गये खुशनसीब ।
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" अफ़साना "
जिस तरह मैं अपने आप को कभी समझता हूँ बेगाना,
ज़माने को भी नही पसंद आयेगा मेरा कोई अफ़साना,
यह भी तो सच है कि कुछ लोग कर के अच्छा बहाना,
सैकड़ों को नचा सकते हैं बजा कर अनोखा तराना ।
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" अस्लीयत "
लोग भले ही नही मान ले यह हक़ीक़त,
उम्र के साथ ज़रूर नज़र आऐगी अस्लीयत,
बन सकती है ज़िन्दगी एक खास मुसीबत,
अगर बचपन में सही तरीके से न हो तरबियत ।
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" अल्फ़ाज़ "
बात कहते हुए इस्तेमाल जब करे कम अल्फ़ाज़,
ज़्यादा असरदार तो हमेशा होता है यह अन्दाज़,
जैसे गज़ल सुनते समय हावी न हो कोई साज़,
तब कानों को कितनी भली लगती है आवाज़ ।
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